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पटना हाईकोर्ट ने ग्रीष्मकालीन अवकाश में बनाया रिकॉर्ड, वर्चुअल सुनवाई में एक सप्ताह में 1137 मामलों का निपटारा

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पटना हाईकोर्ट ने ग्रीष्मकालीन अवकाश के पहले सप्ताह में वर्चुअल मोड पर बड़ी उपलब्धि हासिल की। नौ बेंचों ने कुल 1137 मामलों की सुनवाई कर उनका निष्पादन किया। जानिए कैसे देश का पहला हाईकोर्ट बना पटना हाईकोर्ट।

पटना/आलम की खबर:बिहार की न्यायिक व्यवस्था ने एक बार फिर तकनीक और त्वरित न्याय के क्षेत्र में नई मिसाल पेश की है। ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान भी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावी बनाए रखने के उद्देश्य से Patna High Court ने वर्चुअल मोड में सुनवाई जारी रखी और पहले सप्ताह में कुल 1137 मामलों का निष्पादन कर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। देश के न्यायिक इतिहास में यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पटना हाईकोर्ट उन चुनिंदा अदालतों में शामिल हो गया है जिसने अवकाश अवधि में भी डिजिटल सुनवाई व्यवस्था को व्यवस्थित रूप से लागू कर आम लोगों को राहत पहुंचाने का प्रयास किया।

हाईकोर्ट प्रशासन की ओर से जारी जानकारी के अनुसार ग्रीष्मकालीन अवकाश के पहले सप्ताह में नौ अलग-अलग वर्चुअल बेंचों का गठन किया गया था। इन बेंचों ने लगातार ऑनलाइन माध्यम से मामलों की सुनवाई की और बड़ी संख्या में लंबित मामलों को निपटाया। न्यायिक अधिकारियों का मानना है कि तकनीक के उपयोग से न केवल मामलों के निष्पादन में तेजी आई है बल्कि दूर-दराज के जिलों से आने वाले पक्षकारों को भी काफी सुविधा मिली है। बिहार जैसे बड़े राज्य में जहां हजारों लोग न्यायिक कार्यों के लिए लंबी दूरी तय करते हैं, वहां वर्चुअल सुनवाई की व्यवस्था लोगों के लिए राहतभरी साबित हो रही है।

ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान 18 मई से सुनवाई की शुरुआत हुई थी। पहले दो दिनों में नौ बेंचों के समक्ष लगभग 900 मामलों को सूचीबद्ध किया गया। इनमें से बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई कर उनका निष्पादन किया गया। इसके बाद 20 मई को कुल 1158 मामलों को सूचीबद्ध किया गया, जिनमें से 353 मामलों का निपटारा कर दिया गया। वहीं 21 मई को नौ बेंचों के समक्ष 966 मामले सुनवाई के लिए लगाए गए, जिनमें 294 मामलों की सुनवाई पूरी कर उन्हें निष्पादित किया गया। इस तरह पूरे सप्ताह के आंकड़ों को मिलाकर कुल 1137 मामलों का निपटारा किया गया, जिसे न्यायिक दृष्टिकोण से काफी सकारात्मक परिणाम माना जा रहा है।

न्यायिक विशेषज्ञों का कहना है कि अदालतों में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में यदि अवकाश अवधि में भी सीमित स्तर पर सुनवाई जारी रहती है तो इससे आम लोगों को जल्द न्याय मिलने की संभावना मजबूत होती है। पटना हाईकोर्ट द्वारा अपनाया गया यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी उदाहरण बन सकता है। खास बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुरूप कार्य करते हुए पटना हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को लागू किया है। यही कारण है कि इसे देश का पहला ऐसा हाईकोर्ट माना जा रहा है जिसने ग्रीष्मकालीन अवकाश में सुनवाई को लेकर स्पष्ट एसओपी जारी कर व्यवस्थित रूप से वर्चुअल कोर्ट संचालन शुरू किया।

कोर्ट प्रशासन के अनुसार वर्चुअल मोड में सुनवाई के दौरान तकनीकी व्यवस्था को विशेष रूप से मजबूत किया गया था ताकि किसी भी पक्षकार, अधिवक्ता या न्यायाधीश को परेशानी का सामना नहीं करना पड़े। सुनवाई के दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म, डिजिटल दस्तावेज और ऑनलाइन फाइलिंग जैसी सुविधाओं का उपयोग किया गया। इससे समय की बचत हुई और मामलों के निष्पादन में तेजी देखने को मिली। कई अधिवक्ताओं ने भी इस व्यवस्था को प्रभावी बताते हुए कहा कि भविष्य में नियमित मामलों में भी डिजिटल सुनवाई की भूमिका और बढ़ सकती है।

कानूनी जानकारों का मानना है कि कोविड काल के दौरान शुरू हुई वर्चुअल सुनवाई व्यवस्था अब न्यायिक प्रणाली का स्थायी हिस्सा बनती जा रही है। पहले जहां ऑनलाइन सुनवाई को केवल आपातकालीन व्यवस्था माना जाता था, वहीं अब अदालतें इसे न्यायिक प्रक्रिया के एक प्रभावी विकल्प के रूप में देख रही हैं। पटना हाईकोर्ट की यह पहल इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में न्यायपालिका तकनीकी बदलावों को और अधिक तेजी से अपनाएगी।

हालांकि अदालत प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले सप्ताहों में वर्चुअल बेंचों की संख्या कम की जा सकती है। पहले सप्ताह में नौ बेंचों का गठन किया गया था, लेकिन आगामी सप्ताहों में आवश्यकतानुसार सीमित बेंचों के माध्यम से सुनवाई की जाएगी। इसके बावजूद जरूरी मामलों की सुनवाई लगातार जारी रहेगी ताकि लोगों को राहत मिलती रहे। अदालत की ओर से यह भी बताया गया कि 25 मई 2026 से फिर वर्चुअल मोड में नियमित सुनवाई शुरू होगी।

न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और गति लाने के लिए डिजिटल तकनीक का उपयोग अब तेजी से बढ़ रहा है। पटना हाईकोर्ट की यह उपलब्धि केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकेत भी देती है कि न्यायपालिका अब बदलते दौर के साथ खुद को ढाल रही है। आम लोगों को कम खर्च और कम समय में न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ना इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य माना जा रहा है। यदि आने वाले समय में इस मॉडल को और मजबूत किया जाता है तो बिहार की न्यायिक व्यवस्था देशभर में एक नई पहचान बना सकती है।

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